23 जून 2011

धर्म निरपेक्ष

मैं
सड़क पर गिरा एक पत्थर,
स्कूल से लौटते हुए बच्चे
ठोकरों से  दूर तक
धकेल लाते है,  
और घर चले जाते है,
मै वही पड़ा रहता हूँ निर्जीव,  
फिर कोई मुझे उठाकर
बन्दर भगाने लगता  है, 
बन्दर उसे काटने को दौड़ता है,
मै उसके हाथ से छूट जाता हूँ,   
भटक कर
उस मस्जिद से बाहर
सजदा करती भीड़ पर जा गिरता हूँ, 
भीड़ मेरे जैसे और पत्थर  उठालेती है 
और फेंकती है उस बस्ती में
जहाँ राम कथा चल  रही है, 
पत्थर से पुजारी जी का
अगरखा लाल हो  जाता है , 
और गूंजने लगते है  
धार्मिक उन्माद के स्वर, 
धार्मिक अस्त्रों के साथ, 
त्रिशूल ,तलवार ,छूरे,
अल्लाह हो अकबर ,
हर हर महादेव,
भागमभाग,  
लूटे पिटे भयभीत लोग ,
खून सने चेहरे, 
चीखते चिल्लाते बच्चे, 
धू-धू करते  घर, मकान,
खेत खलिहान, 
लाठिया पटकने की आवाज़,
अश्रू गैसके गोले , 
कदमताल करते बूट, 
सांप्रदायिक सौहार्द के पर्चे, 
टोपियों  की बाढ़,
हेलीकाप्टर की गर्द 
हमारे दिलों में जमने लगती है  सदियों के लिए,  
और कारक मैं  
एक पत्थर, 
आज भी उसी सड़क पर  पड़ा हूँ 
बच्चों की ठोकरों की राह ताकता 
धर्म निरपेक्ष, 

_कुश्वंश  

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