21 जून 2011

सपने तो अपने है

कौन कहता है
सपनों की
परिभाषा नहीं होती,
विस्तृत  निराशाओं की  कोई
आशा नहीं होती ,
गिर तो जाते  है सभी  
रेत महल
हवाओं से,
मगर रेत   को बिखरने में
पल भर भी निराशा नहीं होती,
ऊँट तो बालू में भी 
सोख लेता है मतलब का पानी, 
प्यासे  रहकर भी उसे
कोई    हताशा नहीं होती,  
सपने 
जीने का श्रृंगार बदल देते हैं,  
सपने जीवन का 
आकार बदल देते   हैं, 
सपने देखो मगर 
जीने की ख्वाइश  रखो,  
सपने  मन मंदिर  का   
संसार  बदल देते हैं, 
सपने  हवाओं का
व्योहार बदल देते हैं,

-कुश्वंश
 

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