19 जून 2011

हमारे दोनो



तुम्हें जन्म देने की प्रक्रिया में ही नहीं,
तुम्हें लम्बे समय तक
अपने उदर का हिस्सा बनाने  तक,
माँ का अविश्मरणीय योगदान
तुम्हारी आँखों में 
श्रद्धा और सन्मान
कभी कम नहीं होने देता,
तुम्हारे सुख-दुःख की
सोते जागने परवाह करने वाली माँ,
भले ही नेपथ्य में चली गयी हो,
तुम्हे याद रहे न रहे ,
आज भी तुम्हे  घेरती है
तुम्हारे शरीर का "औरा" बनकर,
और तुम बचे रहते हो अनगिनित रोगों से,
बकौल माँ
अच्छी बुरी नज़रों से, 
देखो
बंद आँखों से
तुम्हे घूरती मिलेंगी दो आँखे,
सिले हुए होंठ,
बढे हुए हाँथ,
चाहत के लिए नहीं
तुम्हे अंक में भरने के लिए,
और देख सको तो
देखो वो दूर   
कुछ   दूर,
तुम्हारी तरफ पीठ किये हुए
मिल जायेंगे तुम्हारे पिता,
तुम्हारे कन्धों को मजबूती देने के लिए
अपने आंशू पोंछते हुए,
वो आंशू
जो कभी नहीं देख पाए तुम,
तुम्हे   देखने ही नहीं  दिए गए
तुम्हे दुखों से बचाने की  चाहत जो थी,
माँ आखिर माँ होती है ,
एक ममतामयी,
उसको नकार सकता है कौन ?
क्या पिता नहीं होता माँ की तरह पितामयी ?
किसने बना दी ये दूरियां
माँ और पिता के बीच
हो सके तो ख़त्म कर दो इन्हें
जिससे रह सके  वो  जो है  सदियों से है  एक, 
एक होकर
हमारी तुम्हारी 
सबकी नज़रों में  .

=कुश्वंश



   

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