18 जून 2011

प्यार तुम्हारा



क्या बसता है  
उसके मन में
कैसे जानू,  
बंद आँख से  
अंतर्मन कैसे पहचानू,
उठती गिरती
अरमानों सी
स्वप्निल पलकें,
पुरवाई में और बिखरती
युवा लटें,
कैसे  बेसुध अंगड़ाई को
पढू,  पुकारूँ,  
श्रृंगार करूं या
मन को कहीं दूर ले जाऊं,
अंतर ध्वनि  की बात सुनूं  या  
ह्रदय दिखाऊँ,
कैसे किसको कहाँ-कहाँ
मन गीत सुनाऊँ,  
सूखा मन क्यों ?
बार-बार
भीगा जाता है,
क्यों  ? प्यार तुम्हारा
मृग मरीचिका
हो  जाता है.

-कुश्वंश
 

  

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