14 जून 2011

जीने का हक







किसी राख में
कब तक छिपी रहती है कोई चिंगारी,
किसे मालूम ? 
राख होने का दर्द  
एक चिंगारी ही सहेज सकती है
दावानल बनने तक,
हम समझ लेते है
राख है
बिखर जाएगी,
तेज हवाओं के थपेड़ों से
अणुओं में बदल जाएगी ,
और न याद रख पायेगी वो
कब और कैसे तब्दील हुयी
एक जीती-जागती,
कैसे ?
सोच लेते  है हम
राख में नहीं छिपी है कोई चिंगारी,
इस अ-नस्वर आत्मा
को नस्वर समझने की भूल
कैसे कर लेते है हम,
वही हवा
जो राख को बेखेरती है दूर तक,
दबी बुझी उस चिंगारी को
दावानल में बदल देती है ,
और राख हो जाते है
राह में पड़ने वाले सभी खेत-खलिहान
पशु-पक्छी इंसान,
चिंगारी  किसी में भेद नहीं करती,
उसे भी राख कर देती है  
जो राख को राख बनाने की
प्रक्रिया में मग्न रहे,
और वो भी जो मूक रहे 
ये समझ कर कि ये राख मेरे घर नहीं उड़ेगी,
प्रतिशोध लेती चिंगारी
याद नहीं रखती
प्रत्यंचा का दायरा,
पूरा परिवेश ही राख हो जाता है,
और हम सोचते ही रह जाते है
काश ! 
दबी चिंगारी देख पाते
तो उसे भी राख कर देते ,
एक बार भी
ये नहीं सोचते  
उस जीती-जागती को 
न होने देते राख,
दे  देते उसे भी
जीने का हक.

-कुश्वंश



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