1 जून 2011

रास्ता दिखाए कौन











तिनके हुए दरख़्त,  
पिलपिले हुए शख्त ,
खुल गए स्कूल  कागजों में
मिड डे खाकर हुए मस्त,
गेहू और गन्ने में
उगने लगी अफीम,
धनिया घर फ़ैल गयी
दूरदर्शन  थीम ,  
हरिया और सुखिया की
ढह गयी दीवार,
गलियों में फ़ैल गया
छज्जे का  प्यार ,
घर घर  में
गलियों में
बेढंगे  ढंग,   
चौकी में आ गए
चुलबुल  दबंग,
बुलबुल को घेर लिया 
बैठाया घर में , 
घरवाले भाग गए
पीने शहर में ,
न जाने कौन सा 
होगा अब हाल,
बहुए मनायेंगी 
सास बिना ससुराल,
झींगुर को बुढ़ापे में
चढ़ गया ताप,  
चीख रहा गलियों में
बुड्ढा होगा तेरा बाप...
ऐसे ही जिनमे है
सामर्थ  दिशा देने की,
संस्कृति की, मूल्यों की
ताकत है सजोने की,
प्रश्न है ?
इन भटकों को
रास्ता दिखाए कौन, 
आप ,
हम ,
या कोई नहीं, 
सब मौन 
बस मौन ...

- कुश्वंश
   







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