25 मई 2011

मुझे भूल ही जाओ













तुमने कहा
मुझे भूल जाओ,
ना  याद करो
ना  सपने  सजाओ, 
और ना ही
कोई कसक बनकर
मेरी आँखों में किरकिराओ,
.................
मैं ,
भूल जाउंगी
वैसे  ही जैसे,
कितनी ही  बार
भूल गए थे तुम ,
और मैं
तुम्हे याद में रखने का
उपक्रम करती रही थी सालों साल,
तुम्हारे
ओस भर पिघल जाने से,
कई बार पिघली थी  मै
तुम्हारे  आगोश में
बर्फ की सिल्ली  बनकर,
तुम्हारे गरजने भर से,
नाचने लगती थी मै
मोरनी बनकर ,
इस भ्रम मै की तुम
अब बरसे..तब बरसे,
तुम्हारी अंजुरी में बही हूँ
कई बार
नदी बनकर,
ये जानते हुए भी की
नदी के किनारे
कहाँ  मिलते  है कभी,
और शायद..!
सूखी नदी के किनारे ही नहीं होते,
आज मै ना वो पथिक हूँ
जो चिलचिलाती  धुप में
प्यास से
हो रहा हो व्याकुल,
और ना ही वो पपीहा
जो
पी कहाँ-पी कहाँ रटे
और  तोड़ दे दम,
मै पिघलती बर्फ भी हूँ,
बहती नदी भी,
चिलचिलाती धुप भी,
खुशनुमा सदी भी, 
किनारों का भय नहीं मुझे,
देख रही हूँ समुद्र,
जिसमे मै जा मिलूंगी,
और तुमसे कभी नहीं कहूँगी
मुझे भूलना मत ..,
बेशक
मुझे भूल जाओ,
अब तो मुझे भूल  ही जाओ .

-कुश्वंश






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