23 मई 2011

रिश्ते लहुलुहान हो गए,














कंक्रीट के जंगल में सब
रिश्ते लहुलुहान हो गए,

आये थे जीने सपनो को,
ह्रदय-भींच सारे अपनों को,  
सपने सब शमशान हो गए,
रिश्ते लहुलुहान हो गए............

जीवन भर की पूँजी खोकर ,
घर रचने का स्वप्न संजोकर,
न जाने सब कहा खो गए,  
सारे घर  मकान होगये,
रिश्ते लहुलुहान हो गए......

इससे तो वो गाव भला था,
कछुए जैसी  चाल चला था,
रिश्तों के रेशम धागों में,
प्रेम प्यार का रंग भरा था,
क्या पाया जो भरे  कुलांचे,
रुपये पैसों के उपर नांचे,
कक्का ,ताऊ, काकी भौजी,
सब आंटी के नाम हो गए,
रिश्ते लहुलुहान हो गए.....

लौटा दो वो खेल खिलौने ,
नदियों के वो तरल बिछौने ,
बागों में अमिया की गंध ,
नहीं चाहिए कृतिम सुगंध,
लौटाओ गुड़ियों का खेल,
बच्चों की वो छुक-छुक रेल,
छुपा-छुपी, बागों  के खेल,
वीडियो की दूकान हो गए,
रिश्ते लहुलुहान हो गए.......

प्रगतिशील कितना भी होले,
पहले अपना हृदय टटोले,
कही दबे-छिपे पन्नो में 
पहले मन मंदिर को तौलें,
संस्कारों और परम्पराओं को
पहले सहज भाव  से खोले,
देखोगे सब रिश्ते-नाते ,
हरे भरे खलिहान हो गए....  
 
 

-कुश्वंश



  




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