21 मई 2011

रिश्ते-नाते











एक दुबली पतली
माँ
अचानक धडधडाती हुयी
मेरे चैंबर  में घुस  आती है
और अश्रुपूरित आँखों से 
अपना पेट दिखती है
सूखी छाती तक , बिना शर्म  
भूख लगी है बेटा
मे उठकर  उसे पकड़ लेता हूँ
उसका ब्लाउज नीचे कर देता हूँ
शर्म से गडकर
बिना माँ से नज़रें मिलाये  उसे
सोफे पर बैठाता  हूँ
घंटी बजाकर
पानी मगाता हूँ
साथ ही कुछ खाने को भी
उसके आंशू नहीं रुकते
तो में उसका हाँथ  पकड़ लेता हूँ
माँ क्या तकलीफ है तुम्हे
वो तुड़ी मुड़ी बैंक की पासबुक दिखाती है
इसमें विधवा पेंसन नहीं आयी
दो दिन से भूखी हूँ
पेंशन घर नहीं ले गयी तो 
बेटे बहू
न खाना ही  देंगे
न इलाज़ कराएँगे
मैंने देखा पेंसन तो अभी भी नहीं आयी
माँ शायद जन्मों से भूखी-प्यासी थी
चार गिलाश पानी पी गयी
और दोनों समोसे
फुर्ती से खा गयी  
मैंने पूंछा
माँ कितने बेटे है
उसने चार उँगलियाँ उठा दी
कहाँ है
काम पर गए है
नाती के साथ आयी हूँ
छोटी बहू भी आयी है
बाहर ही खड़ी है
कहती है झूठ बोलती हो
बैंक से पैसा ही  नहीं लाती  ये बुढ़िया
मरने के लिए जमा करेगी क्या ?
मै बाहर   से उसके
नाती और बहु को बुला लेता हूँ
बहू पचास साल की होगी
नाती भी पचीस से कम नहीं
मैंने पूछा
क्यों भाई
इसे भूखा क्यों रखते हो ?
आखिर माँ है
बेकद्री क्यों करते हो ?  
इलाज़ भी  नहीं कराते
कैसे बेटे हो ?
नाती बोला
हम बेटे नहीं है
जो बेटे है , वो कुछ नहीं कमाते
जो कमाते है सब बम्बई में उड़ाते है
दादी की पेंसन ही सहारा थी
चार महीने से नहीं आयी
हर साल पांच सौ लगता था
प्रधान के घर
प्रधान भी क्या करे 
उसे भी तो देना पड़ता है  
तब साल भर  आती थी
इस बार देने को नहीं थे , रुक गयी
हम क्या चोरी करें  ,
कैसे फ़र्ज़ निबाहे
चार में एक मर गया
तीन बम्बई में ,
अपनी अपनी खोलियो में सो गए
हम नाती है
दो बीघा जमीन , सात बच्चे , एक विधवा बहन
प्राइवेट गाडी चलाते है
ग्रहस्ती कैसे चलायें
आपने पूंछा है तो बताओ  
मैंने जेब से सौ रुपये निकले
माँ को दिए, नाती से कहा  
इसे ले जाओ
बुखार की दवा दिलाओ
अबकी आना
खोलीवाले  बेटों का पता लाना
हो सका तो उन्हें बताऊंगा
माँ की छाती से निचोड़ गए जो दूध
उन्हें  दूध का क़र्ज़ सिखाऊंगा
माँ चली जाती है
मै सोचता हूँ
कुछ कर पाऊँगा क्या ?
खेत से घर
घर से गली
गली से पंच 
पंच  से पंचायत
पंचायत से तहसील
तहसील  से जिला
जिले से प्रदेश 
प्रदेश से देश 
कहा कहा लडूंगा 
और इनसे लड़ भी लिया तो 
बेटे 
बेटी
बहु 
नाती-पोते
रिश्ते-नाते  
सब लाइन में है
किस-किस को  हाज़िर करूंगा
मै बगलें झांकता हुआ  
कभी खुद को देखता हूँ
कभी अन्श्रुपुरित
छाती खोले माँ को
कभी मेज़ पर पड़े समाचार पत्र को
जहाँ बह रहे है टनों
घडियाली आंशू
भट्टा-पारसोली में ही नहीं
उसके नाम पर सारे देश में  
किसानो के लिए
तथाकथित किसान का बेटा बनकर
मै
माँ के लिए
शायद ही कर पॉऊ कुछ  

-कुश्वंश



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