20 मई 2011

हमारे लिए परशु उठाओ .










जिसे हम
पहले तो जन्म ही नहीं लेने देते थे,
गलती से जनम गयी तो
असम्मानित स्वागत से
कुचल देते थे
जनम लेने वाली को ही नहीं
देने वाली को  भी,   
फिर लगाते थे पहरे,
बचपन से लेकर युवा  तक,  
कभी घरके,
कभी बहार के,
और कभी अपने से छोटों के भी,  
जब तुमसे नहीं होती
हमारी तथाकथित हिफाज़त,
तो जड़ से उखाड़कर सौप देते हो
किसी अंगरक्षक को
संपूर्ण अधिकारों के साथ ,
और वो उसे  
न घूँघट  से निकलने देता है,
न परदे से ,
झाकने भी नहीं देता है खिडकियों से 
न जाने कौन से डर से,
....  
बदलाव की बाते तो बहुत करते हो, 
करते क्या हो ? 
यदि करते तो,
यहाँ भी,
वहां भी ,
परायों में भी,
अपनों में भी , 
नहीं होता
दिन प्रतिदिन बलात्कार ,
और ,
ना ही होता
शर्मिंदगी भरा अपमान,
हमने समझ लिया,
अबला रहकर
अब कुछ नहीं हो सकता,
हमें ही
उठ खड़ा होना होगा,
तोड़ने होंगे सारे तिलस्म,  
सारी वर्जनाये,
ऐसे ही नहीं
सांप लपेटकर 
लिपट गयी थी मै 
उस  तथाकथित अंगरक्षक से 
निर्वस्त्र,  
तुम चीखते रहे,
चिल्लाते रहे,
चीखे तुम तब भी थे,
जब
जानबूझकर गिरा दी थी मैंने  
फैशन की पोशाक
सरेआम,
वो प्रतिकार था
तुमसे,
तुम्हारी सोच से, 
अब मुझे परम्पराओं का नहीं रहा डर, 
मूल्यों की भी नहीं  कोई  परवाह,
डूब जाये कितने ही मूल्य,
तुमने कौन सी
धार्मिकता का निर्वाह किया ,
हमारे  अस्तित्व को नकारकर,
हमें अबला नाम देकर
कितना खुश होते हो तुम ,
सदियों से,
सारी परम्पराए,
सारे  मूल्य,
सारे संस्कार ,
और न जाने कौन-कौन सी रेखाएं   
हमारे  लिए ही क्यों खीची है तुमने , 
शास्त्रों में भी,
पुराणों में भी,
उपनिषदों में भी,
और जब चाहते हो बना देते हो 
एक नया दायरा,
हमारे शरीर को कैनवास समझकर ,
और चाहते हो
हम उस दायरे को समझें
न चाहते हुए भी,
सोचकर देखो,
कैसा लगता है,
जब  कोई दायरा तोड़कर
तुम्हारी दुखती रग छेड़ता है,
तुम्हे कर देता है हवाले
धर्म भीरुओं के,
जो करते है तुमसे तरह तरह के सवाल ,
परम्पराओं के,
मूल्यों के ,
धरोहर के,  
मूल्य जो तुमने बनाये थे,
तुम्ही निबाहो ,
..............
यदि चाहते हो
तुम्हे कोई दुःख न हो
तो सोच बदलो,
कुछ वर्जनाये तुम भी जानो,  
अपने लिए भी खीचो
लक्ष्मणरेखा,
हमें देर नहीं लगती सीता बननें में
तुम राम न सही
परशु - राम ही बन जाओ,
और सही अर्थों में
हमारे  लिए
परशु उठाओ .

-कुश्वंश


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