16 मई 2011

खुश रहो .. बस खुश रहो













सुनते हो
वहाँ अकेले क्यों बैठे हो ,
पेड़ो के झुरमुट में किसे तलासते हो ,
डूबते हुए सूरज को
नहीं देखना चाहिए,
तुम्ही कहते थे ना,
ये फ़ोन भी नहीं रख सकते साथ ,
किसी ने याद किया तो, 
अरे कौन याद करेगा हमें,
तुम्हारे सिवा,
आओ ..
तुम भी यहाँ बैठो,  
उस चिड़िया को देखो
कैसी गोल-गोल घूम रही है,  
दाना चुगते
उसके दोनों  बच्चे
घोसले से गिर गए,
वो चिडा 
चोंच से 
आक्रोश में  खोद  रहा है मिट्टी ,  
कितना सूनसान लग रहा है   
उसका घोसला,
अपने घर की तरह ,
कमाल करते हो प्रोफ़ेसर साहब 
हर बात में अपना घर  जोड़ते हो,      
सूरज को क्या ?
अभी छिप जायेगा,
दिन भी,
कितना रुकेगा   
अभी  चला जायेगा ,
तुम्हें  कौन समझाए,
कल दिन
फिर आयेगा,  
सूरज
फिर उगेगा,
चिड़िया फिर घोसला बनाएगी,
कालांतर में   
बच्चो को फिर दाना चुगाएगी,
जिन्दगी रूकती है क्या  ?
हा.. रूकती है,
जैसे हमारी,
उस अभागी के  बच्चे तो
घोसले से गिर गए, 
हमारे तो
हमसे ही पंख लेकर उड़ गए, 
अब तो कमबख्त हवा भी 
उधर से नहीं आती,  
अब ये तन्हाई भी तो    
सही नहीं जाती,
कैसी  बहकी  सी बात करते हो 
जिसका मतलब नहीं कोई 
क्यों दहकी सी बात करते हो ? 
जीवन के  स्वर्णिम काल में  भी  तो  हम
अकेले थे, 
बच्चे तो  फिलर थे 
गैप  भरने आये थे,
हमारी गोद में ,  
तुम्हारे कन्धों पर  
उम्मीद  ही तो  भरने  आये  थे,    
सूरज  गया तो क्या ?    
वो देखो चाँद 
उग रहा है,  
और सारा घर नहा रहा है  
दुधिया चांदनी से ,    
हमारे हनीमून की तरह, 
कैसे हो तुम 
न ही इस पर कविता ही लिखते हो    
और न ही ...  
बच्चों की बात ही  मानते हो   
खुश रहने की  
जैसे भी हो..  
जहाँ भी हो  ..
खुश रहो
बस..
खुश रहो .

-कुश्वंश    




हिंदी में