11 मई 2011

बेटियां




मेरी दो साल की बेटी
झाड़ू की सीक से
स्कूटर को पीट रही थी
और बोलती जा रही थी
में..ले .. पापा.. को चोट लगाता है
उस समय मै
स्कूटर के  स्टैंड से लगी चोट पर
डेटोल लगा रहा था 
मेरी पत्नी मुझे चुपचाप 
कंधे से  थपथपा कर 
इस नन्ही भावुकता को  
दिखाना चाहती थी  
मैंने उसे गोद में उठा लिया 
उसकी आँखों में  
मोटे-मोटे आंशू थे  
मै वो आंशू  आज तक नहीं भूला
बेटी की आँखों में आंसू , 
विदाई पर भी नहीं थे 
इतने मोंटे   
सिसकती हुयी चल दी थी
माँ को  देखते हुए , 
मुड़-मुड़ कर     
तब...  
मोटे आंशू
मेरी आँखों  में थे  
जिन्हें मै रोकना चाह  रहा था  
बाहर आने से, 
बेटी ने देख लिया 
कार से भागती हुयी  आयी  और    
पोंछने लगी मेरे आंशू 
मेहदी सजी उंगलियों से
वो उंगलिया मेरे हृदय में  
आज भी बसी है  
चित्रकारी की तरह 
और मेरी बेटी  
मेरे जीवन में बसी है तुलिका की तरह  
जो हर पल छिड़कती है रंग 
इन्द्रधनुषी 
ये ठीक नहीं  
बेटियां कहा अपनी होती है ?
दिलों में  रहती है जो 
बेटियां सदा
अपनी होती है 
सदियों से  अपनी होती हैं
तुम  समझो तो ..... 

-कुश्वंश

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