1 अप्रैल 2011

तुम्हे याद दिलाने











एक शाम
सूनसान सडक पर
धीमे कदमो से
चलते हुये
मुझे मिल गयी
मेरी ही शक्ल
वो मुस्कुराकर
पहले आगे निकली
फ़िर वापस मुडी
और मेरे कन्धे पकड लिये
प्रश्नवाचक मुद्रा मे ?
तुम तो ऐसे ना थे
सम्वेदनाहीन,निरन्कुश,प्रतिकारक,
अग्यानी, ह्रदयहीन
तुम्हारा ह्रदय
कब छोड गया साथ तुम्हारा
और तुम मानने लगे मन की
उगली पकड कर जिसकी
तुम चलना सीखे
उसकी आखो की रोशनी छिनी
तब कहा हो तुम
उस दर्द से दोहरे हुये जन्मदाता की उगली
कब छोड दी
याद है क्या ?
वो जिसकी गोद मे
बचते थॆ तुम मुह छुपाकर
कैसे बचते हो...!
उसकी परछाई से अब
वो जो
एक अन्जान के साथ
इस बालात्कारी युग मे
बिना ये जाने कि
कब तक निबाहोगे उसे,
चल दी थी तुम्हारे साथ
उस पन्खे से लट्की है
अभी भी
इस आशा से शायद उतार लो तुम
लेकिन मै तुम्हे क्यो बता रहा हू
तुम तो अपनी
उत्तरोत्तर प्रगति मे
कुचलते चले आये हो सब कुछ
इस सुविधाराज मॆ
तुम्हे तो ये भी याद नही
तुम्हारा भी था कोइ अक्स
मै आज भी तुम्हारे पीछे खडा हू
तुम्हे याद दिलाने
तुम्हारी जमीन,
तुम्हारा आसमान,
तुम्हारी श्वासे,
तुम्हारा ह्र्दय,
तुम्हारा देश,
तुम्हारा धर्म

हिंदी में