22 मार्च 2011

काश समझ पाते ...?

जैसे आयी
वैसे  ही 
हो गयी होली,
रंग ने बिखेरे
कई रंग,
हवाओं ने
ढेर सारी   उमंग,
फिजाओं ने खोली जब 
खिड़की  आपदाओं की,  
सहम गयी पुरवाई
फागुनी हवाओं की,  
हमने जो बनाये थे
अपने  आकाश,  
हम पर ही बरसे
बनकर कुछ ख़ास ,  
कुदरत के त्रिनेत्र  
दिशाओं में उभरे,
करिश्मे जो देखे ना थे 
हवाओं  मैं बिखरे,  
गंभीर   शांतदूत ने 
ली जब  करवट,  
टूट गए 
सब बन्ध
सारे तट,  
पानी में 
फ़ैल गयी
धुएं की   आग,  
प्रकृति ने गुनगुनाया 
धीरे से फाग,  
विज्ञानं जब-जब  
होता है   लाचार
उठने लगते हैं 
जेहन में
अनगिनित सवाल 
कौन है जिसे 
समझ कर भी नहीं समझे  पाए
न हम, न तुम, न आप.. 
काश समझ पाते ...? 

-कुश्वंश
   

हिंदी में