18 मार्च 2011

फिर होली आयी

रेत सा
सूखा था मन
खेत सा
बंजर था तन
बैठ गए थे  सपने  सारे
कोने छिपके
सिमटे, सिकुड़े,
खुशियों की नज़रों से बचके
सात समुन्दर पार जा बसे
अपने थे जो
शायद अपने
अब तो धूमिल

मिलन की आस
हृदय जा बिधी
वफ़ा की फांश
उगने लगी कोपलें फिर से
कोमल निर्झर
ओस बिंदु सी
शीतल निर्मल
बुझी-बुझी सी
योवन की चिंगारी ने
फिर से क्यों
ले ली अंगडाई
मन को रंगने
तन को रंगने
क्यों ?
ये कैसी
फिर होली आयी

-kushwansh

( होली के रंग आप सब के दिलों में
खुशियों के रंग भर दें इन्ही शुभकामनाओ
सहित आपका कुश्वंश)  

 

हिंदी में