8 मार्च 2011

कहाँ की हूँ मैं











आज एक माँ नहीं रही
बाबूजी गोद में रखे उस ठन्डे शरीर को
अपने से अलग नहीं करना चाहते थे
किसकी प्रतीक्षा थी  
बेटे की तो नहीं थी 
सात समुंदर पार से कैसे आता वो
क्रियाकर्म कर लेना
कह दिया था उसने
बाबूजी जानते थे उसकी मजबूरी
कभी  दरवाजा देखते
और कभी बर्फ होती माँ को
उसी माँ को
जो बेटे के जाने पर
तीन दिन
भूख प्यास से तड़पती रही थी
मुई नौकरी
मार के ही दम लेगी
बेटा हाथ हिलाते उड़ गया था
...
लोग पूंछ रहे थे
ले चलें भाभी को
और वो कभी बेवफा हुयी माँ को देखते
और कभी सामने के दरवाजे को
मानो किसी का इंतज़ार हो
है  तो उनकी
एक  छुटकी भी
मगर वो भी तो है हजारो मील दूर
भारी  मन से वो उसे
पञ्च तत्त्व में लीन कर आये
चली गयी पहले जो  पहले जाने को  
हमेशा कहती थी
और इसी  पहले मै-पहले मै  पर  
कई बार
बंद हो जाती थी बोल-चाल
शाम तक सब चले गए
वो भी
जो भाई बनके आये थे,
दूर तक साथ निभाने  
अचानक दरवाजे पर दिखी छुटकी
दौड़कर गोद में समां गयी
अविरल अश्रुधारा से भीग गए बाबूजी 
ये भी नहीं कह पाए
क्या करूंगा 
सारी रात
रोते  रहे थे बाबूजी
छुटकी   के बालों में हाथ फेरते  
सुबह छुटकी  सामान सामान बांध रही  
ये क्या कर रही है बेटी
क्या कर रही हूँ ?
सामान बांध रही हूँ आपका
अब नहीं रहने दूगी यहाँ
अम्मा  को नहीं समझा  पाई
उनको तो बेटी का नहीं खाना था
मूल्य चुकाकर भी नहीं
पानी भी तो साथ लाती थी खरीदकर
आप तो मुझे समझेंगे न, 
बेटी क्यों माँ को रुसवा करोगी
यहाँ तो उसका गुनाहगार था ही
वहा भी हो जाऊगा ..
मुझे न ले चल
मैं तेरे साथ नहीं जाऊगा
छुटकी धम्म से बैठ गयी
..
आह !
आज तक नहीं हो पाई मैं  
आपकी संतान, बेटे की तरह
एक  जैसा पाकर जनम भी
क्यों बेटी ही रही ?  
क्या मेरा हक़ नहीं तुम्हारे हक़ में
कहाँ की  हूँ मैं
आपके घर में उगी
दूसरे घर में रोंपी गयी
कहाँ है मेरी जड़
पत्तियाँ और तना तो सूख  जायेगा
जड़ नहीं होगी तो कितना चलेगा
मैं कहा जाऊगी
मेरी भी है दो बेटियां
बिना जड़ की
कौन सा ब्रम्हांड तलाशू
और वहां रोंप आऊ उन्हें  
फलता हो पूरा पेड़ जहा, जड़ सहित
और जहा माँ और बाप
सिर्फ अम्मा और बाबूजी हो
इसके उसके नहीं
बुढापे की लाठी कोई  एक न हो
ना ही हो
अपने ही पौधे को
भूलने की कोई मजबूरी
मिल जाए मुझे   
शायद  कोई और पृथ्वी
कहीं पर
कोई जमीन 

-कुश्वंश  



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