6 मार्च 2011

कोई भीख नहीं मांगनी तुमसे

क्यों करते हो ढोंग
हमारे  उत्थान का
आज भी 
खिला देते हो अफीम 
नव-जन्मा को 
या फिर 
फेंक देते हो कूड़े में 
किसी सूनसान सड़क के किनारे 
कुत्ते-बिल्लियों को नोचने के लिए
हमारे जन्म पर
कोई खुशी नहीं होती तुम्हे

कसकते मन से स्वीकारते हो
बधाई
पढ़ाने भेजते हो दूर तक
क़र्ज़ लेकर
बुढ़ापे की तथाकथित लाठी को
और हमें
भेजने चल देते हो
किसी  और के घर चाकरी करने
और लग जाते हो
मुझे ही  
अपने घर लाने की फिराक में
किसी सामान की तरह
खरीद  कर नहीं,
बुढ़ापे की लाठी को बेंचकर
ये कैसी उलट्वाशी है  
एक खरीददार
जो खरीदकर भी नहीं होता खरीददार
और खरीदे हुए सामान को
उसी दूकानदार को सौप  देता है
अपने सामान के साथ,
वाह ...
घर लौटता है 
अपने पड़ोसी की बिकवाली देखकर
मोल भाव करके भी
कम मिलने की भूंख में
जला देता है हमें
किसी और को बेंचकर लाने के लिए 
बस....
अब और दिवस मत मनाओ
सोच बदलो
हमें जन्म देनेवालो
हम पर विश्वास करो
हम भी बन सकती है लाठी
तुम्हारे सहारे की
तुम्हे पालने से शुरू होकर
तुम्हारे पैरों पर  तुम्हे खडा करने तक
तुम्हारी माँ होकर
और 
तुम्हे सहेजने तक
कितने झंझावातो से गुजरी हूँ मैं
पत्नी बनकर
तुम  सोचते भी नहीं हो शायद
बस एक दिवस  मनाकर 
कर देते हो इतिश्री 
नहीं..बिलकुल नहीं 
अब कोई भीख नहीं मांगनी तुमसे
उठा ली है  कमान तरकस से  
खीच चुकी हूँ कान तक प्रत्यंचा
देख रही हूँ
मछली की आँख भी
पा ही लूंगी अपना आसमान
तुम मत आना 
मेरे आसमान के रास्ते
अब ये वाणों को  रोक नहीं  पाउंगी मै
कदापि नहीं..
तुम्हारे चाहने पर भी नहीं

-कुश्वंश



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