4 मार्च 2011

मन है













अपने दिल की  

बात कहू
कुछ तुम्हे बताऊँ.
इधर-उधर की
बात न कर मै
सीधे आऊं,
तुमको कुछ  
छूने का का मन है.
चोरी-चोरी
छिपके-चुपके,
सपनें भी देखे  
डर-डर के,
रेशम सी
मखमली छुवन भी
बंद आँख
महसूस करूँ.
गिरती-उठती
पलकों के
आमंत्रण की
पहचान करूँ.
अंतर्मन में
बरस  रहा जो
नेह निमंत्रण. 
झरती निर्मल  बूंदों में
बहक रहा 
स्वप्निल आलिंगन.
आज हवाओ
सा करीब
बहने का मन है. 
उमड़-घुमड़ती
केश घटाए,
भीगे-भीगे
ओस-बिंदु सा
चाँद छुपाये,
आज चांदनी धवल, 
सजल
होने का मन है.

तुमको अपना
बस अपना
कहने का मन है.
और पास,
कुछ और पास
जीने  का मन है,


-कुश्वंश

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