24 फ़रवरी 2011

सपना सजाया है










तिनके- तिनके जोड़कर
एक घर बनाया है,
चाँद तारे तोड़कर 
सपना सजाया है,  
सूर्य की परछाईया  
फ़ैली है छत पर,
बादलों ने उम्मीद का 
मौसम  जगाया  है, 
कल तलक 
आगोश से भी, दूर थी
पुर्वाईयाँ,
बहकी हवाए,
दे रही थी 
प्यार की तन्हाईयाँ , 
कुछ कहने के ,
कुछ सुनने के,  
शब्द भी बाकी न थे,  
रेत से सम्बन्ध बिखरे
दर्द भी शाकी न थे,  
ऐसे-में,  देहरी लांघकर
देने चली दस्तक फिजा,
गीत गाने को मचलती 
फागुनी, पछुवा हवा, 
कौन है जो
रक्त में श्रृंगार रस 
भरने चला, 
कौन है जो मर्म में 
मनुहार रस भरने चला,
तुम बताना,
मैं नहीं खोलूगा ऑंखें,  
बंद ही रक्खूगा अब 
डर  रहा हूँ 
उन्माद के पल  
स्वप्न न हो जाये सब.

-कुश्वंश


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