19 फ़रवरी 2011

संवेदना मर जाएगी











प्रश्न है बस
प्रश्न का उत्तर नहीं
खो गया जो घर
कही  वो घर नहीं
जल रही थी,
सदियों से जो  
प्यार की लौ 
कब बुझी,
कैसे बुझी,
क्योकर बुझी
जल रहे इस प्रश्न का  
उत्तर नहीं
खांसती  है
मुह दबाये
वेदना
किसको इससे है तनिक
संवेदना   
तुम तो बस
प्रगति की सीढ़ी चढो
दंभ  और अभिमान से
आगे बढ़ो
छूट जाने दो उन्हें
जो प्रेम भूखे
तुम रहो रेत से,
बस
सूखे-सूखे.  
तुम तो बस
टकसाल  में सिक्के गढ़ों
उन गढ़े सिक्को से फिर
सिक्के बनाओ
भूंख से उपजी हुयी उस भूंख को
तुम आजमाओ
भूंख फिर भी भूंख है
बढ़ जाएगी
प्रेम की भाषा समझ न आयेगी
सिक्को से संवेदना गर
तौलोगे तुम
एक दिन संवेदना मर जाएगी

-कुश्वंश










 

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