15 फ़रवरी 2011

तुम्हारे बिना


एक शहर
वीरान सा
तेज मरकरी, सूर्य की
रोशनिया फीकी
कंधे छीलती भीड़ में 
पसरा रहा  
नीरव सन्नाटा, 
सैकड़ो मील
कोई ओर-छोर नहीं जिसका
हलाहल समुद्र 
दूर तक
किनारों की आस में  
नील हुए रंग में  भी
नहीं
कोई उमंग  
तेज रफ़्तार
सडको में
फर्राटे से उड़नछू
टुकड़े
प्रेम-शब्द
रिम-झिम सावन में
पतझड़  सा
सूखा
व्याकुल मन
तुम्हारे बिना

-कुश्वंश  

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