30 जनवरी 2011

ये देश हमारा है


ये देश हमारा है,
हमने डोमिनोस फ़ोन किया,
पिज्जा तीस मिनट में मिलगया,
सौ  नंबर की काल,

और अस्पताल की अम्बुलेंस,
आ रही है,
आ जाये शायद.... 
उसके दम तोड़ने तक .
कार खरीदोगे, सस्ती हो गयी है
प्याज महगा है, 
टमाटर महगा है,
शिक्षा महगी है, 
बस कुछ सस्ती है, तो जिन्दगी जो
कुछ पलो में  ही
छिन जाती है,
इज्जत जो, 
सरे आम लूट ली जाती है,
और मीडिया में
सुर्खिया बन जाती है,
और कभी-कभी मीडिया भी
लूट लेती है बची खुची इज्जत.
एक किसान,
जो कर्च लेकर दाने बोता है,
बिचौलिए तो घूमते है
आन से शान से,
और वो
कर्ज, ना चुका पाने के डर में
झूल जाता है रस्सी से, 
आजादी की  गोल्डेन जुबली के बाद भी
कभी जननी सुरक्छा योजना,
कभी विधवा पेंसन ,
अन्त्योदय कार्ड,
विकलांग योजना,
गरीब आवास योजना,
महामाया योजना,  
और ना जाने किन-किन योजनाओ के लिए,
दिन भर बैंको के चक्कर लगाता है,
नरेगा हो या मनरेगा,
उसे तो वही मिलता है जो उसे दिया जाता है.
मै भी ये कहा की दिनचर्या  ले बैठा,
इसी में तो गाव-देहात का सूरज उगता है,
और डूब जाता है
कभी फूश की झोपडी में आग लग जाती है,
कभी बाढ़ का पानी, कही का नहीं रहने देता
सरकार अच्छी है
सब का कुछ ना कुछ मुआबजा दे देती है
वोटो के लिए
क्या?
आज के पैदल  मार्च से भारत की कहानी बदलेगी,
कोई हुंकार,
किसी के हृदय में 
कहानी बदलने का रक्त उबलेगी .
शायद उबाल दे 
हमारा, तुम्हारा, उनका
सबका खून ..................बहाने के लिए.

-कुश्वंश

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