23 जनवरी 2011

तुम कौन हो

तुम कौन हो
मै पूंछता हू स्वयं से
और बगले झाकने लगता हूँ 
अपने को खोजने के लिए 
स्वयं को जानने के लिए 
नाम तो कुछ भी हो सकता है 
दिनेश, महेश, सुरेश या  हमीदा
मगर ये पहचान तो नहीं मेरी 
रोटी के लिए हाथ पैर तो सब मरते है
चाहे कोई पहचान हो,  या ना हो 
क्या फर्क पड़ता है
पहचान के बिना
फर्क पड़ता है 
मानवीय संवेदनाओ के लिए हाथ पैर ना मरने से 
तुमने भी नहीं मारे शायद
मैंने  तो नहीं ही मारे  
अगर मारे होते तो
भौतिक सुख और स्वयं की 
उतरोत्तर प्रगति के लिए
नहीं चीख  रहे होते
मानवीय  संवेदनाओ के लिए
चीख रहे होते
तुम्हारी प्रगति तो
रुकने वाली चीज नहीं है शायद
-कुश्वंश

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