14 अक्तूबर 2010

जवान कद

कौन कहता है खून के आंशू नहीं होते
कही भीतर से जब भी आते है पर
दिखाई नहीं देते
चेहरे को कई आकर दे देते है
आँखों को छिपाने की कला आने लगती है
न चाहते हुए भी
मगर छिपा नहीं पाती आंखे 
अनबहे
खून के आंशू
तार-तार होते कपड़ो से झाकते जवान कद
हाथो से छिपाते-छिपाते














गिर  ही जाते है खून के आंशु
और उन्हें पोछने को 
 हाथ छूने लगते है जवान कद
कहो कैसे बचाए
न बहाए खून के आंशु
इससे तो अच्छा है बह जाने दे
शायद आज की भूंख मर जाये
मेरी  भी, उनकी भी

-महेश कुश्वंश

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