9 मई 2014

सच जो नही बोला












जब कभी भी 
अकेले  होता हूँ मैं
और सन्नाटे को चीरती हुयी  कोई हवा
मुझे सच और झूठ के मर्म का एहसास कराती है
मै उन समवेदनाओं को 
झटक कर किनारे लगा देता हूँ
और दंभ में
अंतरात्मा का सच बाहर नहीं आने देता
बस अपनी स्थिति बदल कर
कुछ और सोचने लगता हूँ
मुझे झूठ का कोई मलाल नहीं होता
और सच को  जमीदोज़ करने का भी नहीं  
कोई प्रायश्चित नहीं
बस धड़कने तेज हो जाती है
और स्वत: दाहिना हाथ 
कस कर जकड़ लेता है हृदय
श्वांस फूलने लगती है
दया की मुद्रा मे माथे पर चुहचुहा आए पसीने  में
अतीत घूम जाता है
भोली भली सी तुम
महज सात फेरों के गांठ से बंधी तुम
चली आई थी 
अपनों से दूर
कितने ही कसमों-वादों से अंजान 
और अंजान उन आने वाले कठिन समय से भी 
जो सिर्फ तुमने जिये
और मैं 
तमासबीन सा  उस आग को जलते देखता रहा
जिसमे ध्वस्त हो रहा था 
तुम्हारा  स्त्रीत्व
तुम्हारी पहचान
कितने ही निकल गए वोमेंस डे
मगर मैं आज भी उसी सड़क के कोने मे 
कूड़े से दाने  बटोरती 
पड़ी हूँ 
तुम्हारे उस झूठ की वजह से
जो तुमने सच नही कहा 
आज भी नही
चाहो तो अभी भी 
दाहिने हाथ को बाई तरफ हृदय पर रख कर
पसीना सूखा सकते हो
वो सच बोलकर .........

कुशवंश



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