6 मार्च 2014

छोटी छोटी खुशियाँ


मेरे शहर
मुझे बहुत याद आते हो तुम
दूर तक सड़कों पर
इक्का दुक्का वाहन
मै साइकिल पर
कोसता फिरता था
कभी अपने को
कभी भगवान को
काश ऐशी गाड़ियों का सुख
मेरे नसीब मे भी होता
दुकानों मे पलक पावड़े बिछाए
दुकानदार
ग्राहक को देखते ही
आवभगत मे जुट जाता था
सामान न खरीदने पर भी
फिर  आइएगा की संस्कृति निभाता था
पड़ोसी की नई कार पर कई दिनों
मिठाइयों का दौर चलता था
इसके उसके यहा
रोज दावतों का ठौर लगता था
मानो गाड़ी पूरे मोहल्ले की आई हो
बेटी बेटियों की शादी बोझ नही होती थी
मोहल्ले भर का जश्न होता था
दामाद सारे  मोहल्ले का था
बहू हर घर की लक्ष्मी थी
चौराहों पर मै आगे , तुमसे आगे का
शोर नही होता था
क्रासिंग पर ट्रेन जाने का इंतज़ार
धैर्य से करते थे लोग
त्योहारों पर एक दूसरे की खुशियों मे शरीक होने का
शगल नही
मन होता था
दूरदर्शन पर
पूरा मोहल्ला देखता था चित्रहार
और ठहाके लगाता था
गुप्ता जी पकौड़िया खिला कर
गर्व से मुसकुराते थे
चौराहे के कुएं पर
राजनीति के दाव पेच  चले जाते थे
और हँसते मुसकुराते
सब सोने चले जाते थे
मेरे शहर
मुझे बहुत याद आते हो तुम

-कुशवंश



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