10 अगस्त 2013

चाँद निकलते देखा


खुली आँखों से 
कल
चाँद निकलते देखा 
छिपे  अरमानों को
कल 
करवट बदलते देखा
घुप्प अन्धेरा था 
दिखता  न था 
हाँथ को हाथ 
तुम्हारे  चेहरे  को
मेरा
चेहरा पढ़ते देखा
कवितायें ही कवितायें 
बिखरने लगीं 
चाँद सितारों की तरह 
खूबियां पलने लगीं 
कई 
दिलकश नजारों की तरह
भूले बिसरे कई जमाने 
याद आने लगे 
कानों के पास कई भौरे 
गुनगुनाने लगे
सोचता हूँ 
क्या 
उमंगों का मौसम है 
अबकी श्रावण में 
लगता है 
दिलभर  दम है....


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