17 मार्च 2013

हमारा चेहरा


सोचता हूँ
बिना पंख
उड़ जाऊं
और उस  को कोसूं
जिसने पंख नहीं दिए ....
सोचता हूँ
प्रारब्ध से  मिली  सम्रधता से
टेढा चलूँ
इतराऊँ
पैरों तले ,
दबते,
कीड़े मकोडों पर
फब्तियां कसूं
अपात्रों को
पात्रता की कसौटी पर तौलूँ
और तराजू को कहीं दूर
रसातल में  फेंक आऊँ
सोचता हूँ
कौन सा रंग चढ़ेगा मुझपर
जो मुझे
रंगीन भी रहने दे
और मुझे कालिख से भी बचाले
मेरी इस जमीन से
दूर उस आसमान तक
बहुत से ईश-कण बिखरे हैं शायद
जिनकी खोज में
कई .आइन्स्टीन और गलीलियो लगेंगे
मगर  उन  गलियों  में
कोई नहीं करेगा
कैसी भी खोज
जहां प्रचुर मात्रा में
श्रम बिन्दु  गिरे  हैं
जो अभी अभी
गगन चुम्बी इमारतो  से बहकर
लौटे है
अपने आशियाँ में ..रोज की तरह .
आओ
एक और जहां तलाशे
क्योंकि यहाँ पर अब कोई खोज नहीं बाकी
जो हमें
हमारा चेहरा दिखा दे ....
अपना चेहरा ...



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