17 मार्च 2013

हमारा चेहरा


सोचता हूँ
बिना पंख
उड़ जाऊं
और उस  को कोसूं
जिसने पंख नहीं दिए ....
सोचता हूँ
प्रारब्ध से  मिली  सम्रधता से
टेढा चलूँ
इतराऊँ
पैरों तले ,
दबते,
कीड़े मकोडों पर
फब्तियां कसूं
अपात्रों को
पात्रता की कसौटी पर तौलूँ
और तराजू को कहीं दूर
रसातल में  फेंक आऊँ
सोचता हूँ
कौन सा रंग चढ़ेगा मुझपर
जो मुझे
रंगीन भी रहने दे
और मुझे कालिख से भी बचाले
मेरी इस जमीन से
दूर उस आसमान तक
बहुत से ईश-कण बिखरे हैं शायद
जिनकी खोज में
कई .आइन्स्टीन और गलीलियो लगेंगे
मगर  उन  गलियों  में
कोई नहीं करेगा
कैसी भी खोज
जहां प्रचुर मात्रा में
श्रम बिन्दु  गिरे  हैं
जो अभी अभी
गगन चुम्बी इमारतो  से बहकर
लौटे है
अपने आशियाँ में ..रोज की तरह .
आओ
एक और जहां तलाशे
क्योंकि यहाँ पर अब कोई खोज नहीं बाकी
जो हमें
हमारा चेहरा दिखा दे ....
अपना चेहरा ...



12 टिप्‍पणियां:

  1. सोचता हूँ
    कौन सा रंग चढ़ेगा मुझपर
    जो मुझे
    रंगीन भी रहने दे
    और मुझे कालिख से भी बचाले
    सुंदर और भावपूर्ण आज के जीवन संदर्भ में कहती हुई रचना
    बधाई-------

    आग्रह है मेरे ब्लॉग में सम्मलित हों,प्रतिक्रिया दें
    jyoti-khare.blogspot.in

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  2. आओ
    एक और जहां तलाशे
    जो हमें
    हमारा चेहरा दिखा दे ....
    अपना चेहरा ...

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  3. बहुत सुद्नर आभार आपने अपने अंतर मन भाव को शब्दों में ढाल दिया
    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
    एक शाम तो उधार दो

    आप भी मेरे ब्लाग का अनुसरण करे

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  4. बहुत नया अंदाज कविता का |
    आशा

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  5. आओ
    एक और जहां तलाशे
    क्योंकि यहाँ पर अब कोई खोज नहीं बाकी
    जो हमें
    हमारा चेहरा दिखा दे ..
    अपना चेहरा ..

    बहुत सुन्दर हृदयस्पर्शी भावाभिव्यक्ति....

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  6. बहुत गहराई होती है आपकी रचनाओं में ..

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  7. गज़ब लिखा आप ने बधाई ....

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  8. ये चेहरा तो कोई नहीं दिखाता और हम खुद देख नहीं पाते .... बहुत अच्छा लिखा !!!

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  9. मन की व्याकुलता ,
    मन का भटकाव
    तलाश रहा है
    एक धरातल.....

    बहुत की गूढ़ भाव लिये रचना ऊँचाइयों को छू रही है...

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  10. गहराई लिए ... भावों की अभिव्यक्ति ...

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आपके आने का धन्यवाद.आपके बेबाक उदगार कलम को शक्ति प्रदान करेंगे.
-कुश्वंश

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