11 दिसंबर 2011

इंतज़ार


मुझे इंतज़ार है
उसका
जिससे भर जायेंगे
मेरी बेटी के जीवन में
इन्द्रधनुषी रंग
अपनी नन्ही-नन्ही
गोल गोल आँखों से दिखायेगा  
धरती-आसमान
संपूर्ण ब्राम्हाण्ड
परियों का देश
नन्हे हाथों से जकड लेगी
बालों की लटकती लट
लट छुड़ाने को जैसे ही झुकेगी
मारेगी नाक पर नन्हे पैर
आजायेंगे
बेटी के आँख में आंशू
शिकायत में हँसेगी वो
चीखेगी...... मम्मी......
और मम्मी ..
बचाने की जगह हस  रही होंगी
और वो
अजीब सी आवाज़ में
बजा रही होगी....शीटी
चलायेगी पैरों की
तेज़ रफ़्तार सायकिल
और साईकिल ..
तब और तेज हो जायेगी
जब नानी पकड़ेगी पैर
बदलने को डायपर
और माँ बेटी दोनों नाकाम हो जायेंगी
और पहनते ही अध् पहना डायपर
एक झटके में उतर जायेगा
और लटका होगा
दाहिने पैर के अंगूठे में
और यूं ही बज रही होगी शीटी
माँ और बेटी
हारे हुए मुक्केबाजों की तरह
रिंग में बैठ जायेंगी
पैरों   की साईकिल चलती ही जायेगी   
और बजती रहेगी
अपनी धुन में शीटी
मै
नानी और बेटी की शिकस्त पर
ताली मार के हंसूगा......

-कुश्वंश

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