28 सितंबर 2011

मन का प्रश्न ?

मेरी आँखों के सामने
एक संपूर्ण शरीर
पहले परिवर्तित हुआ
लाल-पीली-हरी धधकती  लपटों में
फिर रह गया अनाकृत आकार
आत्मा जो अमर है
लेने लगती है नया आकार 
और हम देखते रह जाते है 
सिर्फ लपटे
और इन लपटों में भस्म होता शरीर
शरीर को उलट पलट
भस्म करती आग
और  क्रिया की समाप्ति का इंतज़ार करते लोग
और  देखते रहते है
शरीर की अंतिम परिणति
रोते बिलखते लोग अब चुप है
चुप इसलिए भी है  की उन्हें
बहुत से कर्म-काण्ड करने है
सदियों से चले आ रहे ..
जिन्हें वो ना करना चाहता हो
तो भी
और मिटा देना चाहते है
उस शरीर की  सारी निशानियाँ
मुड्वाना है सर 
देना है भोज
पुरोहितों को देनी है दक्षिणा
एक बृहत भोज  जो समाज में सन्मान दिलाये
एक खासी दक्षिणा
जो आकार बढ़ाये  
मेरी कमीज़ उससे ज्यादा सफ़ेद होनी चाहिए
अब इसमें
अन्दर के कपडे रहें न रहें  तो भी
क्या ये किसी शरीर के प्रति सन्मान का तरीका  सही है ?
यदि हां...!
तो प्रागैतिहासिक  युग ही ठीक था
जहाँ हम प्रगति के शैशव काल में थे अज्ञानी 
यदि नहीं,,,!
तो क्या कुछ बदलना नहीं चाहिए ?
क्या ऐसे ही धू...धू  कर जलता रहेगा शरीर
उन आँखों के सामने
जो एक खरोंच लग जाना भी गवारा नहीं करते
जलते हुए देखेंगे ही नहीं
इंतज़ार भी करेंगे
अंतिम टुकड़े को नदी में बहाने के लिए
शरीर की सद्गति के लिए
आखिर कब तक ...
ऐसी ही होगी गति ..
तथाकथित सद्गति.
अब ये आस्था का  प्रश्न नहीं है
न ही धर्म पर कोई सवाल
धर्म तो हमने आपने बनाये है
प्रश्न आपके अंतर-मन से है
उद्देलित मन का  प्रश्न है
आप ही बताओ ............................................

-कुश्वंश

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