27 मई 2010

तुम्हारा दिल

कही अन्दर ही बसता है तुम्हारा दिल
जिसे तुम तलासते  हो इधर उधर,
इसके उसके पास
या फिर शायद मार दिया है उसे
बिना  बताये, क्योकि
तुम्हारे दबे छिपे कामों में नही रहता था शरीक,
न ही तुम्हें, कुछ अनर्गल करने से पहले, चुप रहता था
दिल तो दिल है, कैसे छोड़ सकता था अपनी जड़
जिसे तुम ना जाने कब पीछे छोड़ आए हो
बहुत पीछे

-महेश कुश्वंश

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