vandna लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
vandna लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
18 जुलाई 2011
हमें उबार लेना प्रभू
जब कही कोई
रास्ता ही न हो
हो भी तो
मंजिल न दिखे
दिखे भी तो
डगमगानें लगें पैर
सहारे को उठे स्वार्थी हाँथ
हांथों में हो
अद्रश्य यातनाओं की कीलें
संवेदनाओं से रिक्त हो रहा हो हृदय
हृदय में बह रहा हो
पाशविक रक्त
और चूसने को खड़ी हों
अनगिनित व्यवस्थाएं
तब तुम आना
और हमें उबार लेना
तुम्हारा तीसरा नेत्र ही
अब दे सकता है समाधान
लौटा सकता है पृथ्वी पर
निर्मल गंगा
प्रभू इसे भागीरथी प्रयास समझ
अपनी जटाएं खोल देना
और हमारी छिन्न-भिन्न होती आकृति को
पुनः व्यवस्थित कर देना.
-कुश्वंश
(सावन के सोमवार को ये सौवीं (100 ) अनुभूति परम-प्रभू को समर्पित)
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
