महेश कुशवंश

30 जून 2011

रोटी के लिए



तारकोल और
पत्थरों के किरचों के मध्य
दबी छिपी  रोटियां,
नाखून से कुरेदते
कीड़ों से बिलबिलाते बचपन,
विदेशी सुगंध से
दबी पिसी
चिपचिपी बू,
छटपटाते पाव
ढूंढते फिरते
दो फूटी छाव,
कल दोपहर
मिल गयी उसे
बिना कुरेदे
खून सनी रोटी,
एवज में
भरी भरकम
सड़क कूटने वाली आदिम  मशीन से दबकर
सड़क हो गया
उसका पति,
आज भी उसने वो रोटी
सम्हाल के रखी है
आपनी मांग में
पति की जगह.

-कुश्वंश 

5 टिप्‍पणियां:

  1. आज भी उसने वो रोटी
    सम्हाल के रखी है
    आपनी मांग में
    पति की जगह.
    मार्मिक , संवेदनशील भाव.... सच को प्रस्तुत करती कविता

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  2. सच में बेहद मार्मिक प्रस्तुति...

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  3. गहन अनुभूतियों और जीवन दर्शन से परिपूर्ण इस रचना....

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आपके आने का धन्यवाद.आपके बेबाक उदगार कलम को शक्ति प्रदान करेंगे.
-कुश्वंश

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