महेश कुशवंश

24 फ़रवरी 2011

सपना सजाया है










तिनके- तिनके जोड़कर
एक घर बनाया है,
चाँद तारे तोड़कर 
सपना सजाया है,  
सूर्य की परछाईया  
फ़ैली है छत पर,
बादलों ने उम्मीद का 
मौसम  जगाया  है, 
कल तलक 
आगोश से भी, दूर थी
पुर्वाईयाँ,
बहकी हवाए,
दे रही थी 
प्यार की तन्हाईयाँ , 
कुछ कहने के ,
कुछ सुनने के,  
शब्द भी बाकी न थे,  
रेत से सम्बन्ध बिखरे
दर्द भी शाकी न थे,  
ऐसे-में,  देहरी लांघकर
देने चली दस्तक फिजा,
गीत गाने को मचलती 
फागुनी, पछुवा हवा, 
कौन है जो
रक्त में श्रृंगार रस 
भरने चला, 
कौन है जो मर्म में 
मनुहार रस भरने चला,
तुम बताना,
मैं नहीं खोलूगा ऑंखें,  
बंद ही रक्खूगा अब 
डर  रहा हूँ 
उन्माद के पल  
स्वप्न न हो जाये सब.

-कुश्वंश


12 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर और भावपूर्ण कविता के लिए बधाई।

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  2. मैं नहीं खोलूगा ऑंखें,
    बंद ही रक्खूगा अब
    डर रहा हूँ
    उन्माद के पल
    स्वप्न न हो जाये सब.
    मन के भावों का सुन्दर चित्रण। शुभकामनायें।

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  3. ओह....अद्वितीय !!!

    शब्द भाव प्रवाह सब ह्रदयहारी...मनोहर...

    बहुत बहुत बहुत ही सुन्दर रचना....

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  4. कुछ कहने के ,
    कुछ सुनने के,
    शब्द भी बाकी न थे,
    रेत से सम्बन्ध बिखरे
    दर्द भी शाकी न थे,
    कमाल की रचना ....संवेदनशील पंक्तियाँ..... मन के गहरे भाव लिए ......

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  5. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (26.02.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.uchcharan.com/
    चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

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  6. संवेदनशील ,भावपूर्ण, सुंदर रचना ! शुभकामनाएँ !

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  7. आपकी नज़्म की रवानगी,क्या कहिये.
    नज़म अगर बिना रुके चलती रहे तो कामयाब है.
    आपकी कलम को सलाम.

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  8. अच्छी लगी आपकी ये कविता और अच्छा लगा आपके ब्लॉग पर आकर.

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  9. फागुनी, पछुवा हवा,
    कौन है जो
    रक्त में श्रृंगार रस
    भरने चला....

    बहुत खूब ....

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  10. मैं नहीं खोलूगा ऑंखें,
    बंद ही रक्खूगा अब
    डर रहा हूँ
    उन्माद के पल
    स्वप्न न हो जाये सब.

    ---------

    कभी कभी ऐसे ही कुछ डर मेरे भी जेहन में आते रहते हैं । जो रोकते हैं कुछ कहने से और पलकों कों जोर से भींचे रखने की हिदायत भी देते हैं ।

    .

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  11. प्रिय बंधुवर कुश्वंश जी
    सादर सस्नेहाभिवादन !

    कल तलक
    आगोश से भी दूर थी
    पुरवाइयां
    बहकी हवाएं
    दे रही थीं
    प्यार की तन्हाइयां


    क्या बात है !

    कौन है जो
    रक्त में श्रृंगार रस
    भरने चला
    कौन है जो मर्म में
    मनुहार रस भरने चला

    आहाऽऽहा … ! क्या सुंदर प्रवाह है भाषा का …

    तुम बताना,
    मैं नहीं खोलूगा आंखें,
    बंद ही रक्खूंगा अब
    डर रहा हूं
    उन्माद के पल
    स्वप्न न हो जाये सब …

    सुंदर सुरुचिपूर्ण रचना के लिए बधाई ! मंगलकामनाएं !!

    महाशिवरात्रि की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !

    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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आपके आने का धन्यवाद.आपके बेबाक उदगार कलम को शक्ति प्रदान करेंगे.
-कुश्वंश

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