महेश कुशवंश

21 मार्च 2016

कब आओगी......




छत से
गलियारे से
छत की मुडेर से
न जाने कब से
जो चिड़ियाँ चहचहाती है
उनमे से कोई भी विदेशी  नहीं
निहायत देसी गौरैया है ये
इसकी घण्टियों सी आवाज़
हृदय को झंकृत करती हुयी
नस नस मे उतरजाती है
कल कल करते झरने
झरने मे अठखेलियाँ करते
जल क्रीडा करते पंक्षी
आग उगलते सूरज की गर्मी  मे
तुम्हारा चोंच खोलकर
लंबी लंबी सांसें लेना
फुदक फुदक कर कभी तिनके बटोरना
कभी बच्चों की चोंच मे
दाना उड़ेलना
मैं अपलक देखता रहता हूँ
अपने घर की लगती है
बिलकुल अपने घर की सी
आले मे सकोरे मे रखा पानी
और पानी मे
चोंच डुबोकर गर्दन झटकती
अनुलोम विलोम कर
पानी की बूंदे बिखेरती  तुम्हें
जाने कब तक एकटक देखता हूँ मैं
मुझे याद आतेहै विदेश गए बच्चे
 एक दिन
 वो उड जाती है
 फिर कभी नहीं दिखाई देती
मैं आज तक उसका इंतज़ार कर रहा हूँ
कानों मे रची बसी वो आवाज़
भूलने नहीं देती तुम्हें
क्यों रूठ गई  हो तुम
और जब से गई हो
इस घर मे कोई गीत नहीं बजा
न ही चहकी कोई खुशी
गौरैया
मुझे इंतज़ार है तुम्हारा भी
और घर मेलौटने वाली खुशी का भी
कब आओगी......

-कुशवंश



कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आपके आने का धन्यवाद.आपके बेबाक उदगार कलम को शक्ति प्रदान करेंगे.
-कुश्वंश

हिंदी में